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Thursday, June 25, 2020

न्यूट्रॉन की खोज किसने की थी? - Who discover Neutron ?

न्यूट्रॉन की खोज किसने की थी?

एक परमाणु तीन प्रकार के मूल कणों के मिलने से बनता है, इन्हें इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन कहते हैं। न्यूट्रॉन और प्रोटॉन मिलकर परमाणु नाभिक  (Nucleus ) बनाते हैं। जबकि इलेक्ट्रान नाभिक के चारो और विभिन्न कक्षाओं में भ्रमण करते रहते हैं । न्यूट्रॉन पदार्थ का एक उप आणविक (Sub -Atomic ) कण है। न्यूट्रॉन पर कोई विद्युत आवेश नहीं होता। 

न्यूट्रॉन की खोज किसने की - Neutron invention

न्यूट्रॉन का आविष्कार - Discovery of neutron

न्यूट्रॉन का द्रव्यमान प्रोटॉन से अधिक होता है। क्या आप जानते हैं  कि न्यूट्रॉन का आविष्कार किसने किया। ?  न्यूट्रॉन का आविष्कार सर जेम्स चैडविक नामक ब्रिटिश भौतिक शास्त्री ने किया था । सन 1900 में वैज्ञानिकों को इस बात का पता चल गया था कि परमाणु में इलेक्ट्रॉन और फोटो नामक विद्युत आवेशित कण होते हैं। इलेक्ट्रॉनों पर ऋणात्मक (Negative)और प्रोटॉन पर धनात्मक (Positive) आवेश होता है। 

वैज्ञानिकों को संदेह था की परमाणु में उदासीन कण भी हो सकते हैं। सन 1932 में चैडविक ने यह प्रदर्शित कर दिखाया कि बेरिलियम (Beryllium) नामक तत्व पर अल्फा किरणों की बौछार करने से जो विकिरण (Radiation) निकलते हैं वे वास्तव में उदासीन कण ही होते हैं। इन कणों का नाम न्यूट्रॉन रखा ।


चैडविक ने इन कणो के दूसरे गुणों का भी अध्ययन किया। उन्होंने आण्विक नाभिक से निकलने वाले न्यूट्रॉन को तीव्र न्यूट्रॉन नाम दिया ।  

चैडविक नहीं समस्थानिको (Isotopes) के अस्तित्व की भी विवेचना की। उन्होंने बताया कि जब किसी समान प्रोटॉन की संख्या वाले नाभिकों में न्यूट्रॉन की असमान संख्या होती है तब ऐसे नाभिकों को उस तत्व का समस्थानिक कहते हैं। 

न्यूट्रॉन की संख्या भिन्न होती है । इसका आणविक भार भिन्न होता है।चैडविक को उनके द्वारा किए गए आविष्कारों पर सन 1935 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। चैडविक ने नाभिक श्रृंखला प्रक्रियाओं पर सराहनीय कार्य किया । उन्होंने वित्तीय विश्वयुद्ध के दौरान विकसित हुए परमाणु बम के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

न्यूट्रॉन के गुणों का अध्ययन करने पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि जब यह कण नाभिक के बाहर होता है, तब अस्थाई होता है। औसतन 12 मिनट में एक न्यूट्रॉन का क्षय हो जाता है। 

समय की लंबाई को न्यूट्रॉन का आधा जीवन कहा जाता है। नाभिक के अंदर न्यूट्रॉन सामान्यता स्थाई होते हैं, लेकिन यदि नाभिक के अंदर इनका क्षय  होने लगता है तब यह पदार्थ रेडियोधर्मी (Radio Active ) हो जाता है। 

न्यूट्रॉन की किरणे खतरनाक होती हैं 

न्यूट्रॉन की किरणें बहुत ही खतरनाक होती है वे आसानी से किसी भी पदार्थ में प्रवेश कर सकती हैं। यही कारण है कि जो वैज्ञानिक संस्थानों में कार्य करते हैं उन्हें अपने आप को सुरक्षित रखने के लिए सुरक्षा कवच पहनने पड़ते हैं

Saturday, June 20, 2020

क्वार्ट्ज़ क्या है? इसके उपयोग और महत्त्व - What is Quartz ?

क्वार्ट्ज़ क्या है? - What is Quartz ?

क्वार्ट्ज़ (Quartz ) प्रकृति से सबसे अधिक मात्रा में मिलने वाला खनिज पदार्थ है। अधिकतर चट्टाने इसी से बनी होती है। यह शुद्ध कायंतरित और तलहटी चट्टानों का मुख्य हिस्सा है। यह वास्तव में सिलिकॉन और ऑक्सीजन का विशेष योगिक है। 

शुद्ध कोर्स में सिलिका और सिलीकान डाइऑक्साइड होते हैं। क्वार्ट्ज़ देखने में काँच की तरह परभासी होता है और यह बिल्कुल काँच जैसा लगता है और काँच की भांति ही भुरभुरा होता है लेकिन यह सख्त होता है और इसके पिघलने का तापमान भी काँच से बहुत अधिक होता है। 

इसे काँच की तरह पिघलाकर नालियां और अन्य उपयोगी सामान बनाए जाते हैं। इन्हें चौकोर टुकड़ों में ढाला जा सकता है। ऑक्सीजन और हाइड्रोजन की लपटों के द्वारा इसे विभिन्न रूपों में ढाला जा सकता है । क्वार्ट्ज आर्थिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण पदार्थ है। 

क्वार्ट्ज़ क्या है? इसके उपयोग और महत्त्व - What is Quartz ?

क्वार्ट्ज़ के रूप  - Quartz different forms 

इसकी बहुत सी किस्में बहुमूल्य पत्थरों के रूप में आभूषणों में प्रयोग की जाती हैं। एमेथिस्ट, सिटिरिन, नीला क्वार्ट्ज़ और धुए के रंग का क्वार्ट्ज़ आमतौर पर आभूषणों में प्रयोग किया जाता है। 

क्वार्ट्ज़ के उपयोग - Quartz uses 


इन सभी रंगों के क्वार्ट्ज से आभूषण बनाए जाते हैं। बलुआ पत्थर, जिसमे प्रचुर मात्रा में क्वार्ट्ज होता है भवन निर्माण के लिए बहुत ही उपयोगी है। क्वार्ट्ज वाली बालू को काँच और और पोर्सलीन के निर्माण में भी प्रयोग में लाते हैं। 

रेगमार्क और घिसाई में काम आने वाले पत्थरों के निर्माण में भी क्वार्ट्ज का प्रयोग होता है इससे पराबेंगनी प्रकाश के लिए लेंस भी बनाए जाते हैं। क्वार्ट्ज से बानी नलिकाएं तथा दूसरे उपकरण प्रयोगशाला में काम आते हैं। 

क्वार्ट्ज से बने तंतु अत्यंत संवेदी तुलओं में काम आते हैं। क्वार्ट्ज एक पीजोइलेक्ट्रिक इलेक्ट्रिक पदार्थ है। पीजोइलेक्ट्रिक पदार्थ वे पदार्थ होते हैं जिन पर दाब लगाने से विद्युत विभव पैदा हो जाता है और विद्युत विभव लगाने से क्वार्ट्ज में प्रसार और सिकुड़ाव अर्थात कंपन पैदा हो जाती है। 

 इसके गुण के आधार पर क्वार्ट्ज द्वारा विद्युत संदेशों को ध्वनि तरंगों में और ध्वनि को विद्युत कम्पनों में बदला जा सकता है क्वार्ट्ज का पीजोइलेक्ट्रिक गुण टेलीविजन, रडार तथा दीवार की घड़ियों के लिए, यह ओसिलेटर (Oscillator ) बनाने में बहुत ही महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ है। 

क्वार्ट्ज मणिभों से बनी घड़ियां बहुत ही सही समय प्रदर्शित करती हैं। क्वार्ट्ज के प्रकृति में मिलने वाले मणिभ मुख्य रूप से ब्राजील में मिलते हैं। क्वार्ट्ज को कृत्रिम रूप से भी बनाया जा सकता है

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Thursday, June 18, 2020

खाने के बाद हमें नींद क्यों आने लगती है? Do you sleep after food?

खाने के बाद हमें नींद क्यों आने लगती है? - Why do we sleep after eating?

 Why we sleep after food.? 

यह एक सामान्य अनुभव की बात है कि अधिक भोजन करने के बाद हमें नींद सी आने लगती है और शरीर में शिथिलता आ जाती है। खाना खाने के बाद बहुत ही गहरी नींद आती है। 

भोजन करने के बाद नींद आने का कारण निम्न प्रकार से समझा जा सकता है । सामान्य व्यक्ति के शरीर में लगभग 5 लीटर रक्त होता है। यह रक्त सारे शरीर में संचरण करता रहता है। 

शरीर के विभिन्न भागों में रक्त की मात्रा अलग-अलग होती है जो आवश्यकतानुसार समय-समय पर बदलते रखती है । सामान्य से आने वाले रक्त का 28% यकृत 24% गुर्दा 15% मांसपेशियों को 14% मस्तिष्क को और शेष 19% शरीर के दूसरे भागों को जाता है । 

यह अनुपात कार्यों के अनुसार बदलता रहता है जब हम भोजन करते हैं भोजन के पाचन क्रिया के लिए पेट को रक्त की अधिक आवश्यकता होती है। 

why do we sleep after food?


Reason of sleep after food - खाने के बाद नींद आने का कारण 


भोजन के बाद शरीर के खून का बहुत सारा हिस्सा पेट में प्रवाहित हो जाता है। परिणाम स्वरूप मस्तिष्क में रक्त की मात्रा कुछ समय के लिए कम हो जाती है। 

मस्तिष्क की क्रियाशीलता कम होना है या नींद का कारण है। मस्तिष्क में रक्त की उचित मात्रा पहुंचने में समय लगता है वास्तव में यह एक ऐसी स्थिति है जब शरीर को आराम की आवश्यकता होती है । 

इसलिए भोजन करने के बाद थोड़ी देर आराम करना बहुत जरूरी है

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Saturday, May 30, 2020

Why mars planet looks red? - मंगल ग्रह लाल क्यों दिखाई देता है?

मंगल ग्रह लाल क्यों दिखाई देता है ? Why planet mars looks red?

 प्यारे दोस्तों आज हम बात करेंगे मंगल ग्रह के बारे में, मंगल ग्रह हमें लाल क्यों दिखाई देता है उसका रंग लाल क्यों है? अक्सर हमारे दिमाग में यह सवाल उठते रहते हैं कि किसी का है किसी गृह का रंग लाल , भूरा , नीला , पीला या किसी और रंग का क्यों होता है ? आइए हम जानते हैं । 

जैसा की हम लोग जानते है कि हमारे सौरमंडल में नौ ग्रह हैं - बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण और यम। यद्यपि यम (प्लूटो ) को अब ग्रह नहीं माना जाता, इसे सितंबर 2006 से बौने ग्रह का नाम दिया गया । यदि सूर्य से दूरी की बात करें तो मंगल चौथा ग्रह है । यह पार्थिव ग्रहों में ब्रहातम है, और इसे अक्सर लाल ग्रह कहा जाता है। तुम इसका कारण जानते हो क्या? 

Why mars planet looks red, मंगल ग्रह लाल क्यों दिखाई देता है?

Facts About mars planet

 जैसा हम जानते हैं कि मंगल ग्रह सूर्य के सबसे नज़दीक ग्रह है। यह सूर्य के साथ ही उदय और अस्त होता है। इसीलिए हम उसे सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद भी देख सकते हैं । इसी तरह शुक्र को या तो सूर्योदय से पहले और कई बार सूर्यास्त के बाद ही देख सकते हैं। परंतु मंगल को हर एक वर्ष के बाद स्पष्ट रूप से 1 या 2 महीने के लिए देखा जा सकता है। 

समस्त ग्रहों में केवल मंगल ही चमक के कारण शुक्र के बराबर समझा जाता है। वह अपने लालिमा युक्त पीले रंग की वजह से अभूतपूर्व भी है मंगल का अध्ययन करने के लिए अनेक अंतरिक्ष यान वहां भेजे गए। इन अंतरिक्ष यानों ने हमें उसके बारे में कई मूल्यवान तथ्य प्रदान किये हैं । 


मगर की धरती पर 1976 में अंतरिक्ष यान बिकींग -1 और 2 ने कदम रखा जो अमेरिका द्वारा भेजे गए थे । उन्होंने मंगल के वायुमंडल में 1 से 2% ऑर्गन, 2 से 3% नाइट्रोजन, 95% कार्बन डाइऑक्साइड और प्रतिशत ऑक्सीजन को पाया । 

 मंगल की सतह चमकदार व अंधेरे से क्षेत्रों से बनी है। मंगल की धरती लालिमायुक्त व पीतवर्ण पाई गई है । जिसकी वजह से इस ग्रह को खास रंग मिलता है । ये क्षेत्र जंग लगे लोहे की तरह लगते हैं और लाल एवं भूरी भूमि की तरह लगते हैं। 

Why mars planet looks red - मंगल ग्रह लाल क्यों दिखाई देता है

Why mars planet looks red?

मंगल पर हवा बहुत तेज गति से चलती है प्रति घंटा 400 किलोमीटर । और मंगल के स्थानों में भारी तूफान पैदा करती है। इन तूफानों से वायुमंडल में लाल रेत छा जाती है। चूँकि मंगल का गुरुत्वाकर्षण खिंचाव कमजोर है इसलिए धूल के कण सप्ताहों तक वायुमंडल में बने रहते हैं। 

इसीलिए मंगल अपनी लाल धूल भरी सतह और वायुमंडल में धूल के कणों के कारण हमें लालिमा युक्त नारंगी रंग का लगता है
Hello, friends, this is the English version of the article Why planet mars look red. There are some reasons why mars planet looks like a red ball. Often some question comes in our mind that planets are blue, brown, red, yellow or some other color. 

Let's know about this. As we all know that there are 9 planets in our solar system - Mercury, Venus, Earth, Mars, Jupiter, Saturn, Uranus, Neptune, and pluto. Although Pluto is not considered a planet after 2006, it's called a small planet. If we talk about mars than it is in 4th place from the sun. It's red in color from other planets which is near to the sun. 

Do you know the reason for that.? As we know Mars is the nearest planet to the sun, it rises up and sets down with the sun, so we can see this before or after sunset. Due to its brightness mars is considered as brighter as Venus planet. For the study of planet mars, many spacecraft and rocket sent to the mars and scientists got to know many new things from these operations. 

On mars, there are 1-2% argon gas, 2-3% nitrogen, and 95% Co2 and oxygen. Why planet march is red After studying it is been found that due to heavy storm around 400Km/h. Sand spread all around the planet and due to less gravitational force, these sand particles remain in the atmosphere for a long time due to this when lighting fall on those particle color of the moon looks orange or red color.

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Monday, May 25, 2020

चंद्रमा के सागर क्या है - What is moon sea, lunar sea?

चंद्रमा के सागर क्या है? What is the moon sea or the Lunar sea?

Hello friends,
what is moon sea, is there mountains on the moon, what kind of nature is there on the moon. All these questions will be solved after reading this article, so here are the full details of the moon sea.

जब हम नंगी आंखों से चंद्रमा को देखते हैं तब हमें उसकी सतह पर कुछ काले धब्बे दिखाई देते हैं। प्राचीन काल के लोगों का विचार था चंद्रमा की सतह पर स्थित यह काले धब्बे पानी से भरे सागर है जैसा कि हमारी पृथ्वी के सागर हैं। गैलीलियो ने चंद्रमा के इन काले धब्बों को 1609 मैं अपनी बनाई हुई दूरदर्शी से देखा । 

चंद्रमा के सागर क्या है? What is the moon sea or the Lunar sea?


उन्हें यह काले धब्बे सपाट सागर के रूप में दिखाई दिए इसीलिए उन्हें चंद्रमा के सागरों का नाम दे दिया गया वास्तव में यह सपाट मैदान है जहां पानी का निशान भी नहीं है । लेकिन पुरानी धारणा के अनुसार हम इन्हें आज की सागर कहते हैं खगोलविद इन सागरों को मेयर इम्ब्रायम कहते हैं चमकीले क्षेत्र वास्तव में पहाड़ हैं। इन पहाड़ों पर सूर्य की किरणें पड़ती है । 


चन्द्रमा के कुछ पहाड़ तो लगभग 1000 मीटर तक पहुंचे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि गहरे विशाल मैदान चंद्रमा की पृथ्वी की ओर वाली सतह पर ही हैं । दूसरी ओर की सतह पर इनकी संख्या बहुत कम है । दूसरी सतह लगभग पर्वतमालाओं से ही ढकी है । चंद्रमा के इन सागरों को दो वर्गों में बांटा जा सकता है । पहले वर्ग में वह सागर आते हैं जो वृत्ताकार और दूसरे में वो जो अनियमित आकार के हैं । 

वृताकार सागर सामान्यत पर्वतों से घिरे हैं। मेयर इम्ब्रायम और मेयर क्रिसियम चंद्रमा की हमारी ओर की सतह है ऐसे ही सागर हैं । अनियमित सागरों में मेयर ट्रैंकुलेटलिस और ओसनियस प्रोसेरम आते हैं। जिनके किनारों पर विशेष पर्वतमालाएं नहीं हैं । चंद्रमा के सागर तांबे की परतों से ढके हुए हैं। इनका का निर्माण संभवता तीव्र वेग से गिरते हुए विशाल शुद्र ग्रह या उल्का पिंडों के चंद्रमा की सतह पर टकराने के कारण हुआ होगा। 


इनकी टकराव से चंद्रमा की सतह फट गई होगी या ज्वालामुखी फोटो होंगे जिनके कारण विशाल मात्रा में लावा बैठकर सतह पर जम गया होगा । चंद्रमा की सतह की चट्टानों की संरचना बेसाल्ट से मिलती-जुलती है अपोलो के अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा इंसानों की चट्टानों के नमूने एकत्रित किए गए हैं और उनका अध्ययन किया गया है, 

इन अध्ययनों से ऐसा लगता है कि सागरों के बेसिन लगभग 350 करोड़ों वर्ष पहले भरने आरंभ हुआ है। चंद्रमा के पर्वतीय भागों की उत्पत्ति सागरों से पहले हुई थी अधिकतर सागर इन पर्वत मालाओं से घिरे हुए हैं |


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Thursday, May 21, 2020

Google photos new features makes sharing cool

Google photos new sharing features

Hello people, do you know no Google recently added a new feature to Google photos. At the end of the 2019 year that is December google has announced this feature and now we can see this sharing feature in Google photo whenever you will open the photo and share them with specific people and their faces will be there. 

Before this feature was not there this was recently added and this will make sharing easy among friends among groups. As we know Google is known for quality and authority, it can be seen each of its product we have YouTube we have Google plus we have Google docs we have Play Store in all the products even Google search engine Google always try to maintain the quality that makes a product good for users.


This feature Gives user good control pic or album and even you can share a photo using link sharing as you do in Google Drive this can be embedded in an email text in a block that makes it easy to share this is not only for Google account users even another user can also use this feature you would have the option to turn the link share on-off time.

Watch video Google photos new sharing feature


पराबैंगनी किरणें क्या है | लाभ, हानि और बचाव- What is ultraviolet rays, benefits, harm

पराबैंगनी किरणें क्या हैं -What is ultraviolet rays and spectrum 
Hello people, 
Welcome to Gyan Vigyan, the knowledge of science. In this article, we will understand what is ultraviolet rays and spectrum. What is it's the importance and it's uses, advantages, and disadvantages. So let's proceed to the topic.

पराबैगनी किरणें क्या होती हैं, परिभाषा, अर्थ - What is ultraviolet rays, definition, meaning?

जब सूर्य के प्रकाश को किसी प्रिज़्म से गुजारा जाए तब यह सात रंगों में विभाजित हो जाती है |  यह एक साथ रंगो की पट्टी होती है, इसमें रंग एक निश्चित क्रम में होते हैं। पहला रंग होता है बैंगनी फिर नीला फिर आसमानी हरा, पीला, नारंगी, और अंत में लाल| इसी सात रंग की इस पट्टी को ही हम वर्णक्रम या स्पेक्ट्रम (Spectrum) कहते हैं।

प्रकाश की ये किरणे तरंगों के रूप में यात्रा करती है।  इन तरंगों को विद्युत-चुंबकीय तरंगे कहते हैं। यह तरंगे कम्पन के फलस्वरूप पैदा होती हैं। प्रत्येक रंग की अलग-अलग आवृत्ति होती है। आवर्ती को हर्ट्ज में मापा जाता है। और अगर हम आवृत्ति की परिभाषा को समझें तो 1 सेकंड में किए गए दोलनो की संख्या को आवृत्ति कहते हैं या एक सेकंड में किए गए कम्पनों को आवृत्ति उसकी कहते हैं। यदि कोई वस्तु 1 सेकंड में एक कम्पन करती है तब उसकी आवृत्ति 1 हर्टज होगी। 

इसे भी पढ़ें  - 
इन सात रंगों में बैगनी रंग के आवृत्ति सबसे अधिक होती है |और लाल रंग की सबसे कम इसी बात को हम दूसरे ढंग से भी कह सकते हैं कि बैंगनी रंग की तरंगदैर्ध्य (Wave length ) सबसे कम और लाल रंग की सबसे अधिक होती है|  इन सात रंगों के प्रति हमारी आंखें संवेदनशील होती हैं इसीलिए विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम यह ये सातों रंग में दिखाई देते हैं 

पराबैंगनी किरणों की स्पेक्ट्रम में स्थान - Ultraviolet rays in spectrum

इसके अतिरिक्त कुछ विद्युत चुंबकीय तरंगे ऐसी भी हैं जो हमारी आंखों को दिखाई नहीं देती। लाल रंग से कम और बैंगनी रंग से अधिक आवृत्ति की तरंगे हमें दिखाई नहीं देती| लाल रंग से काम आवर्ती की तरंगों को अवरक्त किरणें (Infrared  rays) कहते हैं। 

अवरक्त किरणों से कम आवृत्ति की तरंगों को सूक्ष्म तरंगे (Micro  waves)और उनसे भी कम आवृत्ति वाली तरंगों को रेडियो तरंगों (Radio  waves) के नाम से जाना जाता है।  बैंगनी रंग से अधिक आवृत्ति या कम तरंगदैर्ध्य वाली तरंगों को पराबैंगनी तरंगे  (Ultra violet rays)कहते हैं|  पराबैंगनी अधिक आवर्ती की तरंगों को क्रमशः एक्स और गामा किरणों के नाम से पुकारा जाता है। 

पराबैगनी किरणों के लाभ और हानि - Advantage and disadvantage of ultraviolet rays

पराबैगनी किरणों से हानि 

पराबैंगनी किरणों में बहुत अधिक ऊर्जा निहित होती है। इन किरणों की अधिक मात्रा में शरीर पर पड़ने से त्वचा झुलस जाती है। इतना ही नहीं इन से त्वचा का कैंसर भी हो सकता है। पराबैगनी किरणे आंखों के लिए बहुत ही खतरनाक है खुली आंखों पर इनके सीधे पढ़ने से आंखों में सूजन हो जाती है और मोतियाबिंद हो जाता है या आंखों से पानी आने लग जाता है 

पराबैंगनी किरणों से लाभ 

सूर्य के प्रकाश में इन किरणों की बहुत अधिक मात्रा होती है लेकिन वायुमंडल के ऊपरी हिस्से में उपस्थित ओजोन परत द्वारा काफी मात्रा अवशोषित कर ली जाती है |  ओजोन परत ओजोन गैस का क्षेत्र है जो एक परत की भांति पृथ्वी के चारों तरफ विद्यमान है ओजोन परत के अवशोषित कर लेने के कारण पराबैंगनी किरणों की बहुत कम मात्रा ही पृथ्वी तक पहुंच पाती है| अगर से सारी किरणे आ जाएं तो धरती पर जीवन संभव नहीं होगा | 

कम मात्रा में इनके लाभ भी हैं, इनसे बहुत से बैक्टेरिया मर जाते हैं किरणों के द्वारा त्वचा में उपस्थित पदार्थ विटामिन डी में परिवर्तित हो जाते हैं | पराबैंगनी किरणों के इस हानिकारक प्रभाव से बचने के लिए हमें रंगीन चश्मे का प्रयोग करना चाहिए

पराबैगनी किरणों के अनुप्रयोग - Application pf ultraviolet rays

पराबैगनी किरणों के बहुत से लाभ भी हैं इसका ज्यादातर इस्तेमाल त्वचा से जुड़े रोगों में किया जाता है । इसके सीमित इस्तेमाल से मनुष्य को कुछ फायदे होते है और मन मस्तिष्क पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ता है जब यह कुछ पदार्थों पर पड़ती है द्वारा प्रकाश उत्पन्न करती है 

पराबैंगनी विकिरण क्या है - What is ultraviolet radiation

पराबैंगनी किरणें क्या है | लाभ, हानि और बचाव- What is ultraviolet rays, benefits, harm
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